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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
लोक आतुरजनान्विराविण; स्तत्तदेव वहु पश्य शोचतः |  ६०   क
तत्र पश्य कुशलानशोचतो; ये विदुस्तदुभय़ं पदं सदा ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति