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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
कामं देवापि मां विप्र न विजानन्ति तत्त्वतः |  १   क
त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति