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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
सत्त्वस्था निरहङ्कारा नित्यमध्यात्मकोविदाः |  १६   क
मामेव सततं विप्राश्चिन्तय़न्त उपासते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति