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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
रत्नाकराः समुद्राश्च सर्व एव चतुर्दिशम् |  १९   क
वसनं शय़नं चैव निलय़ं चैव विद्धि मे ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति