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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
कामं क्रोधं च हर्षं च भय़ं मोहं तथैव च |  २०   क
ममैव विद्धि रूपाणि सर्वाण्येतानि सत्तम ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति