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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
दैत्या हिंसानुरक्ताश्च अवध्याः सुरसत्तमैः |  २७   क
राक्षसाश्चापि लोकेऽस्मिन्यदोत्पत्स्यन्ति दारुणाः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति