वन पर्व  अध्याय १८७

देव उवाच

तदाहं सम्प्रसूय़ामि गृहेषु शुभकर्मणाम् |  २८   क
प्रविष्टो मानुषं देहं सर्वं प्रशमय़ाम्यहम् ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति