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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदय़िष्यति |  १२   क
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति