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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
अहं त्रिवर्त्मा सर्वात्मा सर्वलोकसुखावहः |  ३३   क
अभिभूः सर्वगोऽनन्तो हृषीकेश उरुक्रमः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति