वन पर्व  अध्याय १८७

देव उवाच

यच्च किञ्चित्त्वय़ा लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् |  ३७   क
विहितः सर्वथैवासौ ममात्मा मुनिसत्तम ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति