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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
अहं नाराय़णो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः |  ४   क
विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति