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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
ततो विवुद्धे तस्मिंस्तु सर्वलोकपितामहे |  ४६   क
एकीभूतो हि स्रक्ष्यामि शरीराद्द्विजसत्तम ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति