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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
आकाशं पृथिवीं ज्योतिर्वाय़ुं सलिलमेव च |  ४७   क
लोके यच्च भवेच्छेषमिह स्थावरजङ्गमम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति