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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितस्तात स देवः परमाद्भुतः |  ४८   क
प्रजाश्चेमाः प्रपश्यामि विचित्रा वहुधाकृताः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति