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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतद्दृष्टं मय़ा राजंस्तस्मिन्प्राप्ते युगक्षय़े |  ४९   क
आश्चर्यं भरतश्रेष्ठ सर्वधर्मभृतां वर ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति