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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
यः स देवो मय़ा दृष्टः पुरा पद्मनिभेक्षणः |  ५०   क
स एष पुरुषव्याघ्र सम्वन्धी ते जनार्दनः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति