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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अस्यैव वरदानाद्धि स्मृतिर्न प्रजहाति माम् |  ५१   क
दीर्घमाय़ुश्च कौन्तेय़ स्वच्छन्दमरणं तथा ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति