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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
स एष कृष्णो वार्ष्णेय़ः पुराणपुरुषो विभुः |  ५२   क
आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा क्रीडन्निव महाभुजः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति