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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य दक्षिणतो भाति दण्डो गच्छञ्श्रिय़ा वृतः |  १४   क
भृग्वङ्गिरोभिः सहितो देवैश्चाप्यभिपूजितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति