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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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तुलाधार उवाच
तस्मात्स्वनुष्ठितात्पूर्वे सर्वान्कामांश्च लेभिरे |  १२   क
अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भिर्वीरुधोऽभवन् |  १२   ख
न ते यज्ञेष्वात्मसु वा फलं पश्यन्ति किञ्चन ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति