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वन पर्व
अध्याय १८७
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मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वेमं वृष्णिशार्दूलं स्मृतिर्मामिय़मागता |  ५४   क
आदिदेवमजं विष्णुं पुरुषं पीतवाससम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति