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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
एते भावा जगत्सर्वं वहन्ति सचराचरम् |  ३४   क
श्रिता विरजसं देवं यमाहुः परमं पदम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति