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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६६
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वैशम्पाय़न उवाच
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीञ्जीवय़ेथा मृतानिमान् |  १७   क
किं पुनर्दय़ितं जातं स्वस्रीय़स्यात्मजं मृतम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति