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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
प्रसक्तवुद्धिर्विषय़ेषु यो नरो; यो वुध्यते ह्यात्महितं कदा च न |  १५   क
स सर्वभावानुगतेन चेतसा; नृपामिषेणेव झषो विकृष्यते ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति