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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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पराशर उवाच
मूलगोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव |  १७   क
अङ्गिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति