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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
यच्चापि द्रव्यमुपय़ुज्यते ह; वानस्पत्यमाय़सं पार्थिवं वा |  २०   क
दिव्येन रूपेण च प्रज्ञय़ा च; तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति