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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
युगं द्वादशसाहस्रं कल्पं विद्धि चतुर्गुणम् |  १४   क
दशकल्पशतावृत्तं तदहर्व्राह्ममुच्यते |  १४   ख
रात्रिश्चैतावती राजन्यस्यान्ते प्रतिवुध्यते ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति