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आदि पर्व
अध्याय १८८
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वैशम्पाय़न उवाच
पाण्डवाश्चापि कुन्ती च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः |  २१   क
विचेतसस्ते तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति