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द्रोण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् |  १   क
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा तव ह्यपनय़ो महान् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति