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शान्ति पर्व
अध्याय १८८
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भीष्म उवाच
समाहितं क्षणं किञ्चिद्ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति |  १३   क
पुनर्वाय़ुपथं भ्रान्तं मनो भवति वाय़ुवत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति