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शान्ति पर्व
अध्याय १८८
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भीष्म उवाच
किञ्चित्स्निग्धं यथा च स्याच्छुष्कचूर्णमभावितम् |  १८   क
क्रमशस्तु शनैर्गच्छेत्सर्वं तत्परिभावनम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति