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शान्ति पर्व
अध्याय १८८
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भीष्म उवाच
स्वय़मेव मनश्चैव पञ्चवर्गश्च भारत |  २०   क
पूर्वं ध्यानपथं प्राप्य नित्ययोगेन शाम्यति ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति