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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः |  ११   क
त्रेताय़ां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति