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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
राजानो व्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर |  १४   क
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति