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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
सत्यं सङ्क्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः |  १५   क
सत्यहान्या ततस्तेषामाय़ुरल्पं भविष्यति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति