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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा वैश्याः सङ्कीर्यन्तः परस्परम् |  १८   क
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति