वन पर्व  अध्याय १८८

वैशम्पाय़न उवाच

स चैतान्पुरुषव्याघ्र साम्ना परमवल्गुना |  २   क
सान्त्वय़ामास मानार्हान्मन्यमानो यथाविधि ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति