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वन पर्व
अध्याय १८८
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वैशम्पाय़न उवाच
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेय़ो मार्कण्डेय़ं महामुनिम् |  ३   क
पुनः पप्रच्छ साम्राज्ये भविष्यां जगतो गतिम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति