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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीय़ते |  ३५   क
स्वय़ङ्ग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति