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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छीभूतं जगत्सर्वं भविष्यति च भारत |  ३७   क
हस्तो हस्तं परिमुषेद्युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति