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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
रथद्विरदपत्त्यश्वानेकः प्रमथसे वहून् |  १६   क
मृगसङ्घानिवारण्ये विभीर्भीमवलो हरिः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति