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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रेष्य चाग्निरथर्वाणमन्यं देशं ततोऽगमत् |  ९   क
मत्स्यास्तस्य समाचख्युः क्रुद्धस्तानग्निरव्रवीत् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति