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वन पर्व
अध्याय २८८
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वैशम्पाय़न उवाच
इय़ं व्रह्मन्मम सुता वाला सुखविवर्धिता |  १३   क
अपराध्येत यत्किञ्चिन्न तत्कार्यं हृदि त्वय़ा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति