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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
क्रय़विक्रय़काले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम् |  ५३   क
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वृत्तिलोभात्करिष्यति ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति