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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय़ करिष्यन्ति क्रिय़ास्तथा |  ५४   क
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति