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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स्वभावात्क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशङ्किनः |  ५५   क
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते युगसङ्क्षय़े ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति