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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथा लोभाभिभूताश्च चरिष्यन्ति महीमिमाम् |  ५७   क
व्राह्मणाश्च भविष्यन्ति व्रह्मस्वानि च भुञ्जते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति