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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
हाहाकृता द्विजाश्चैव भय़ार्ता वृषलार्दिताः |  ५८   क
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति