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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसङ्क्षय़े |  ६२   क
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति