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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति व्राह्मणाः पर्युपासकाः |  ६३   क
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति