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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
विपरीतश्च लोकोऽय़ं भविष्यत्यधरोत्तरः |  ६४   क
एडूकान्पूजय़िष्यन्ति वर्जय़िष्यन्ति देवताः |  ६४   ख
शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान्युगसङ्क्षय़े ||  ६४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति